सम्पादकीय

दबे पांव देश के सात राज्यों में भीम आर्मी ने कब अपना वजूद खड़ा कर लिया, इसका पता ना प्रशासन को लगा ना राजनेताओं को।मजबूत सतम्भ बनते जा रहे सोशल मीडिया भी भनक नही पा सका।जबकि सैकड़ों सोशल मीडिया ग्रुप   भीम आर्मी के चलते रहे। भीम आर्मी के संस्थापक और आर्मी सुप्रीमों चन्द्रशेखर ने मंजे हुए नेतृत्व देते हुए संगठन का ढांचा खड़ा कर दलित युवा शक्ति को संगठित करने में सफलता हासिल कर ली। इसका पता तब लगा जब उ०प्र० के जनपद सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में हिंसा भडकी और रातों-रात पूरे जिले को अपनी चपेट में ले लिया। केंद्र से लेकर प्रदेश शाशन के साथ-साथ दलित नेताओं और दलित राजनीति करने वालो को अपने नीचे की जमीन खिसकती नज़र आयी। शब्बीरपुर हिंसा के बाद आर्मी हीरो चन्द्रशेखर के जेल जाने के बाद कुशल नेतृत्व के अभाव में आर्मी छिटकने लगी।और संगठन में विरोधी स्वर मुखर होने लगे। 
सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में हिंसा के बाद भीम आर्मी रातों-रात सुर्खियों में आयी।हिंसा के दौरान आर्मी के हौसले और ताकत ने शाशन-प्रशासन की चूले हिला दी। शाशन को हिंसा काबू करने में कईं दिन मशक्कत करनी पडी़। सभी बड़े छोटे दलो में शब्बीरपुर को लेकर होड़ लग गयी। सबसे अधिक बौखलाहट बसपा में दिखाई दी, मायावती को अपना परमानेंट वोट बैंक खिसकता नज़र आया तो मायावती ने हवाई यात्रा छोड़ शब्बीरपुर के लिए सड़क का रूख लिया।
    शब्बीरपुर हिंसा के बाद जांच में चन्द्रशेखर को कईं मामलों में हिंसा का आरोपी माना गया। भूमिगत रहते हुए भी चन्द्रशेखर ने जंतर-मंतर पर दलित रैली का ऐलान कर दिया।तब लग रहा था कि ऐलान केवल राजनीतिक फायदे के लिए किया गया है।ये ऐलान फलाप शो होगा । अनुमान के विपरीत जंतर-मंतर पर हजारों की संख्या में दलितों ने दस्तखत दी और चन्द्रशेखर ने मंच से खुलेआम स्वर्णो को भद्दी भाषा में ललकारा और शक्तिमान की तरह गायब हो गया।दिल्ली पुलिस और यूपी पुलिस खाली हाथ रह गयी ।
बताते चलें शब्बीरपुर हिंसा के दौरान काबू पाने के लिए प्रशासन को इंटरनेट सेवा बंद करानी पडी़ थी,  तब जाकर हालातों पर काबू पाया जा सका था।
चन्द्रशेखर के जेल जाने के बाद कुशल नेतृत्व के अभाव में चंदे को लेकर आरोप प्रत्यारोपों का दौर शुरू होते ही आर्मी की ताकत छिटकने लगी और आर्मी से अलग होकर कईं गुट बनने की जमीन तैयार होते ही डॉ अंबेडकर स्टूडेंट यूनियन और बहुजन दलित फ्रंट वजूद में आ गये। स्टूडेंट यूनियन ने तो आर्मी की हिंसा में भूमिका को लेकर प्रेसवार्ता आंमत्रित्र कर ली है। चन्द्रशेखर ने हालातों को देखते हुए आर्मी कमेटी को भंग कर दिया, जिसे अभी तक पुनः घोषित नही किया गया।शायद आर्मी के विघटन का एक कारण ये भी रहा हो।कुछ भी हो दलित जितना जागरूक हुआ है उतना बंट भी रहा है जो बसपा के लिए खतरे की घंटी है। देखना ये है कि जेल से छुटने के बाद चन्द्रशेखर दोबारा आर्मी को कहां तक ले जायेगा या खामोशी अख्तियार कर लेगा या किसी बड़े दल में अपनी सुरक्षा तलाशेगा।ये भविष्य के गर्भ में है।
विरेन्द्र चौधरी
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One thought on “सम्पादकीय

  • December 14, 2017 at 7:15 am
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    verry nic sir

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