विगत कुछ समय से जनचर्चा होने लगी है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी ताकतों का इस्तेमाल अनावश्यक मसलों पर करने लगा है

संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे उच्च और अंतरिम न्याय व्यवस्था है। देश का हर नागरिक इस व्यवस्था को अत्यधिक सम्मानजनक नजरिए से देखता है। क्योंकि इस व्यवस्था के संचालक अति संवेदनशील-बुद्धिजीवी-विवेकशील-कानून का महान ज्ञाता और निष्पक्ष होता है। जब व्यक्ति समाज-प्रशासन-शाशन और निचली अदालतो से न्याय की आस छोड़ देता है या हार चुका होता है या उसे ऐसा महसूस होता है कि उसे कहीं से न्याय नही मिला, तब वह न्याय की आस में सुप्रीम कोर्ट की राह पकड़ता है। सुप्रीम कोर्ट की अपनी एक छवि, एक गरिमा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश अंतरिम आदेश होते है। उसके बाद मात्र महमहिम राष्ट्रपति के यहां ही अपील की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में कभी किसी ने शक या उंगली उठाने की जूररत नही की। सुप्रीम कोर्ट विश्वास का सबसे बड़ा ठीकाना है।
विगत कुछ समय से जनचर्चा होने लगी है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी ताकतों का इस्तेमाल अनावश्यक मसलों पर करने लगा है। जो फैसले सरकार को लेने चाहिए उसमें सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रीय मसलो पर या देशहित-जनहित मसलो को हल करना सरकार का काम है, मगर कईं मसलो में सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करने लगी है। रेल के सफर में आज कुछ लोग चर्चा में सुप्रीम कोर्ट और सरकार की भूमिका पर बहस कर रहे थे। कि रोहिंग्या मुसलमान हिन्दूस्तान में रहेंगे या नहीं, सेना कश्मीर में पैलेट गन चलाये या नहीं, दीपावली पर पटाखे जलाये जाये़ या नहीं, दही हांडी की ऊंचाई कितनी हो, अयोध्या में राममंदिर बने या नहीं। आमजन के हिसाब से इन पर सरकार को नीतिगत फैसले लेने चाहिए ना कि सुप्रीम कोर्ट इसमें हस्तक्षेप करें। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए वो सरकार को उसका काम करने दे। नही तो जनता को मत देकर सरकार बनाने की क्या जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ही प्रधानमंत्री तय कर दे।

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