मन का बंसत

मन मीत बंसत

खेत-खेत फूली फिर सरसों
केसरिया धूप और छाँव में !
नववधू सा रूप , धरे धरती
सुख-समृद्धि बरसाए गाँव में !!

झूमी – महकी डाल फूलों की
इठलाई है फिर कली – कली !
मौसम में फूटे अकुंर स्नेह के
गुँजारे भौंरे फिर गली – गली !!

पुलकित-उमंगित सेमल-टेसू
राग बंसती फिर छेड़े शहनाई !
हँसी सुनहरी जौ की बालियाँ
कूकी कोयल, बहकी अमराई !!

शिशिर को कर विदा ,लेकर
नवपल्लव, नवगात, नवगंध !
तरूणी के रेशमी ख्वाबों सा
लौट आया मन मीत बंसत !!

पारूल तोमर 

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